मध्य प्रदेशसंपादकीय

इस धर्म या कर्तव्य को निभाने से किसने रोका है मिस्टर मीडिया?


पत्रकार यदुवंशी ननकू यादव सतना मध्य प्रदेश
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शहर एक। दृश्य दो। एक में दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति तोपों की सलामी लेते हैं,उनकी पत्नी बच्चों के साथ खुशनुमा माहौल में वक्त बिताती हैं

शहर एक। दृश्य दो। एक में दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति तोपों की सलामी लेते हैं, उनकी पत्नी बच्चों के साथ खुशनुमा माहौल में वक्त बिताती हैं। दूसरे दृश्य में आंदोलन है, हिंसा, आगजनी, मरते हुए लोग, अचानक पहचान छिपाए पथराव करते कुछ नकाबपोश और स्थिति पर काबू पाने में अक्षम देश की सबसे सक्षम पुलिस। दिल्ली की कानून-व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल।

इन दो विरोधाभासी तस्वीरों के बीच मीडिया की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सारी दुनिया उपग्रह चैनलों के जरिये डोनाल्ड ट्रंप और उनके कुनबे की हिंदुस्तान यात्रा देख रही है। पत्रकारिता धर्म के नाते दिल्ली का घटनाक्रम छिपाया नहीं जा सकता और दिखाने पर आलोचक तथा शत्रु देश फायदा उठा सकते हैं। एक तरफ पेशेवर कर्तव्य है। दूसरी ओर राष्ट्रीय छवि को लग रहे झटके और उसका अनुचित लाभ लेते कुछ तत्व हैं। ऐसे में संतुलन का बारीक और महीन बिंदु खोजना अत्यंत संवेदनशील काम है।

कहने में कोई हिचक नहीं कि मीडिया के तमाम रूपों को जितने धीरज, संयम, गहराई और निष्पक्षता का परिचय देना चाहिए था, नहीं दे पाए। दृश्य झूठ नहीं बोलते और कैमरे की आंख से कुछ छिपता नहीं। सब देख रहे थे कि हिंसक दृश्य प्रायोजित थे और पुलिस चुप थी। आंदोलनकारी चेहरे नहीं छिपा रहे और हमलावरों में इतना साहस नहीं कि वे अपनी पहचान उजागर करें। जो आंदोलन महीनों से शांत चल रहा था, उससे निपटने में व्यवस्था नाकाम रही। गांधी के देश में विरोध का स्वर हिंसा के जरिये दबाना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह तथ्य खुलकर किसी माध्यम पर उजागर नहीं हुआ। क्या पत्रकारिता में अब सच को सच कहने का साहस भी नहीं बचा है अथवा हमने अपने-अपने सच गढ़ लिए हैं और उन गढ़े रचे हुए आकारों को ही अंतिम सच मान लिया है। अगर ऐसा है तो यह बहुत खतरनाक प्रवृत्ति इस पेशे में पनप रही है।

अब हमें गांधी के सत्याग्रह के गीत गाने का अधिकार नहीं रहा है। समय आ गया है, जब चैनल प्रमुखों, संपादकों तथा पत्रकारिता के सरोकारों पर केन्द्रित संस्थानों को गंभीरता से इस पर विचार करना होगा। सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। आंदोलनकारियों पर तो सवाल उछाले जा रहे हैं कि वे यातायात रोके हुए हैं, लेकिन यह निर्वाचित प्रतिनिधियों की जिद या हठधर्मी नहीं है कि वे उन मतदाताओं से सीधे संवाद भी नहीं करना चाहते। जनता के सेवक अपना धर्म नहीं निभा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में पत्रकारिता अपना धर्म निभाती है। इस धर्म या कर्तव्य को निभाने से किसने रोका है मिस्टर मीडिया?

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