धर्ममध्य प्रदेश

कैसे हुआ कान्हा का नामकरण संस्कार,क्यों कहते है इन्हें कृष्ण? देखें यहाँ

ज्योतिषाचार्य निधि राज त्रिपाठी के अनुसार—-कारा-गृह में देवकी की आठवीं संतान के रूप में जन्मे कृष्ण के नामकरण के विषय में कहा जाता है कि आचार्य गर्ग ने रंग काला होने की वजह से इनका नाम “कृष्ण” दिया था। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा नगर में हुआ और उनका बचपन गोकुल, वृंदावन, नंदगाँव, बरसाना, द्वारिका आदि जगहों पर बीता था। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद श्री कृष्ण ने 36 साल तक द्वारिका पर राज किया। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था, इसीलिए इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, कन्हैया अष्टमी, कन्हैया आठें, श्री कृष्ण जयंती, श्री-जी जयंती आदि जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है।

जन्माष्टमी शुभ मुहूर्त और समय :
जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त 2020
निशीथ पूजा मुहूर्त 24:04:31 से 24:47:38 तक
अवधि 0 घंटे 43 मिनट
जन्माष्टमी पारणा मुहूर्त 05:48:49 के बाद 13, अगस्त को

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व
शास्त्रों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के व्रत को ‘व्रतराज’ कहा जाता है, इसीलिए इस दिन व्रत एवं पूजन का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से साल में होने वाले कई अन्य व्रतों का फल मिल जाता है। भगवान विष्णु के आठवें अवतार कहे जाने वाले कृष्ण के दर्शन मात्र से ही मनुष्य के सभी दुःख दूर हो जाते हैं। जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से इस व्रत का पालन करते है, उसे महापुण्य की प्राप्ति होती है। जन्माष्टमी का व्रत संतान प्राप्ति, सुख-समृद्धि, वंश वृद्धि, दीर्घायु और पितृ दोष आदि से मुक्ति के लिए भी एक वरदान समान है। जिन जातकों का चंद्रमा कमजोर हो, वे भी जन्माष्टमी पर विशेष पूजा कर के लाभ पा सकते हैं।

ज्योतिषाचार्य निधि राज त्रिपाठी के अनुसार—-अलग अलग राज्यों में हैं कृष्ण के अनेकों नाम
वैसे तो भगवान श्री कृष्ण के अनेकों नाम हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी नाम हैं जो बेहद प्रचलित हैं और अलग अलग राज्यों में उन नामों से जाना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को उत्तर प्रदेश में ब्रजवासी, माधव, नंद गोपाल, बांके बिहारी, वासुदेव, गोविंद और गोपी आदि नामों से पुकारते हैं, तो वहीं राजस्थान में उन्हें “श्री नाथजी” और “ठाकुर जी” के नाम से पुकारा जाता है। गुजरात में “द्वारकाधीश” एवं “रणछोड़दास” के नाम से जाना जाता है, तो महाराष्ट्र में विट्ठल तो के नाम पुकारते हैं।

उड़ीसा में कृष्ण को “भगवान जगन्नाथ” तो बंगाल की तरफ “गोपाल जी” के नाम से पुकारा जाता है। दक्षिण भारत में कृष्ण की “वेंकटेश” या “गोविंदा” के नाम पूजा की जाती है, जबकि असम, त्रिपुरा, नेपाल आदि जैसे पूर्वोत्तर क्षेत्रों में कृष्ण नाम से ही लोग इनकी पूजा करते हैं। नाम चाहे कुछ भी हो, लेकिन पूरे देश-दुनिया के लोग श्री कृष्ण के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हैं और उन्हें पूजते हैं।

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जन्माष्टमी व्रत और पूजा विधि
जन्माष्टमी व्रत में अलग-अलग जगहों पर लोग अपनी सच्ची श्रद्धा से अलग-अलग तरीके से पूजा-व्रत करते हैं। कुछ लोग जन्माष्टमी के एक दिन पहले से व्रत रखते हैं, तो वहीँ अधिकांश लोग जन्माष्टमी का व्रत अष्टमी तिथि के दिन उपवास और नवमी तिथि के दिन पारण कर के करते हैं। इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही रख सकते हैं।

जन्माष्टमी व्रत को करने वाले को व्रत से एक दिन पहले यानि सप्तमी को सात्विक भोजन करना चाहिए।
अष्टमी को यानि उपवास वाले दिन प्रातःकाल उठकर स्नानादि करें। फिर सभी देवी-देवताओं को नमस्कार करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं।
अब हाथ में जल और पुष्प आदि लेकर व्रत का संकल्प लें और पूरे विधि-विधान से बाल गोपाल की पूजा करें।
दोपहर के समय जल में काले तिल मिलाकर दोबारा स्नान करें। अब देवकी जी के लिए एक प्रसूति गृह बनाएँ। इस सूतिका गृह में एक सुन्दर बिछौना बिछाकर उसपर कलश स्थापित कर दें।
अब देवकी, वासुदेव, बलदेव, नन्द, यशोदा और लक्ष्मी जी का नाम लेते विधिवत पूजा करें।
रात में 12 बजने से थोड़ी देर पहले वापस स्नान करें। अब एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछा लीजिए और उसपर भगवान् कृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
कृष्ण को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराने के बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाकर उनका श्रृंगार करें।
बाल गोपाल को धुप, दीप दिखाए, उन्हें रोली और अक्षत का तिलक लगाकर, माखन-मिश्री का भोग लगाएँ। गंगाजल और तुलसी के पत्ते का पूजा में अवश्य उपयोग करें। विधिपूर्वक पूजा करने के बाद बाल गोपाल का आशीर्वाद लें।
जन्मष्टमी के दिन व्रत रखने वाले लोगों को रात बारह बजे की पूजा के बाद ही व्रत खोलना चाहिए। (इस व्रत में अनाज ग्रहण नहीं किया जाता है। आप फलहार कर सकते हैं या फिर कुट्टू या सिंघाड़े के आटे का हलवा बना सकते हैं।)

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तीन वक़्त में की जाती है श्री कृष्ण जी की पूजा
दो दिन मनाए जाने वाले जन्माष्टमी के त्यौहार में कुछ लोग कृष्ण के जन्म से पहले व्रत रखते हैं, तो वहीँ कुछ लोग कृष्ण के जन्म वाले दिन व्रत रखकर रात के समय जन्म के उपरांत व्रत खोलते हैं। इस दिन मुख्य रूप से तीन वक़्त में कृष्ण जी की पूजा की जाती है। आप भी अपनी श्रद्धा अनुसार व्रत रखकर कृष्ण जी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
ज्योतिषाचार्य निधि राज त्रिपाठी के अनुसार—-चलिए जानते हैं तीनों वक्त में की जाने वाली पूजा के विषय में-

पहली पूजा
जन्माष्टमी के दिन की पहली पूजा सुबह सूर्योदय के समय की जाती है। इसके लिए सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करने के बाद कृष्ण की पूजा करें। इस दौरान व्रत रखने वाले लोग कृष्ण जी के बाल रूप की पूजा करें। जो लोग जन्माष्टमी से एक दिन पहले रखते हैं, वो इस पहली पूजा के बाद अपना व्रत खोल सकते हैं।

दूसरी पूजा
जन्माष्टमी के दिन की दूसरी पूजा दोपहर के समय की जाती है। दोपहर के समय सबसे पहले माता देवकी का जलाभिषेक करें, इसके बाद उनके लिए सूतिकागृह का निर्माण कर पूजा करनी चाहिए। देवकी माता की पूजा के बाद श्री कृष्ण की विधि-विधान से पूजा करें।

तीसरी पूजा
जन्माष्टमी के दिन की तीसरी पूजा बहुत खास होती है, जो विशेष रूप से मध्यरात्रि के 12 बजे यानि कृष्ण जन्म के समय में की जाती है। इस समय श्री कृष्ण के बाल रूप की पूजा करें। साथ ही जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने वाले लोग कान्हा को भोग लगाने के बाद अपना व्रत खोल सकते हैं।

जन्माष्टमी के दिन इन बातों का भी रखें ध्यान
इस खास दिन भूलकर भी किसी प्रकार के पेड़-पौधों को हानि न पंहुचाए। यथासंभव ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करें। इस दिन राधा-कृष्ण मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन ज़रूर करें। यदि संभव हो तो अपने घर में या फिर मंदिर में कीर्तन का आयोजन करें। भगवान कृष्ण को मोरपंख बहुत पसंद था, इसलिए जन्माष्टमी की पूजा करते वक़्त पूजास्थल पर कृष्ण की मूर्ति या चित्र के पास मोरपंख ज़रूर रखें। कृष्ण जी की मूर्ति के पास एक लकड़ी की बाँसुरी भी ज़रुर रखनी चाहिए।सभी ज्योतिषीय समाधानों के लिए क्लिक करें: 9302409892

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