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जानिए क्यों मनाया जाता है? शिक्षक दिवस

ज्योतिषाचार्य निधि राज त्रिपाठी के अनुसार —–भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार पञ्च महा-शक्ति की उत्पत्ति सृष्टि निर्माण और उद्धार के लिए अधिष्ठात्री गो, गंगा, गायत्री, गौरी, गीता के रूप में प्रकट हुई है, और इसी पावन अक्षर ‘ग’ से गुरू और ज्ञान की रचना होती है, जिसने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को दिव्य ज्योति प्रदान की है। ज्ञान को व्यावहारिक रूप में उतारना तथा उसको ग्रहण करना शिक्षक-शिष्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण पक्ष होता है।
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भारतीय संस्कृति में शिक्षक को माता, पिता, गुरू के समान आदरणीय एवं ब्रह्राा, विष्णु, महेश के समान पूजनीय माना गया है। ज्ञान को वितरित करने वाला शिक्षक गुरू के रूप में सदा ही वन्दनीय रहा है। शिक्षक का नाम आते ही ज्योतिष जगत में देव-गुरु बृहस्पति का स्मरण आता है। वास्तव में, गुरू का संबंध देव-गुरु बृहस्पति से होता है, जो ज्ञान के भंडार हैं और इस मानव जगत में शिक्षक, यानि गुरु के रूप में अवतरित हैं।
शिक्षक का अर्थात होता है शिक्षा प्रदान करने वाला, तथा शिष्य का अर्थ होता है शिक्षा ग्रहण करने वाला। शिक्षक से तात्पर्य केवल किताबी ज्ञान बांटने वाले से न होकर जीवन को एक संपूर्ण मार्गदर्शन देने वाले से है। जिस कारण प्रतिवर्ष पूरे भारत वर्ष में विद्यालयों, महा-विद्यालयों जैसी शैक्षणिक संस्थानों में बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मना कर दर्शन-शास्त्र के महा-नायक व भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

शिक्षक व बृहस्पति ग्रह का संबंध
भारतीय ज्योतिष में बृहस्पति (गुरू) को समस्त ग्रहों में अत्यंत शुभ, ज्ञान का प्रदाता और मानव का परम मित्र माना गया है। गुरू को देवताओं का गुरू अर्थात देव-गुरु नाम से भी जाना जाता है। यदि जन्म पत्रिका में बृहस्पति ग्रह बलवान होकर केन्द्र में हो तो जातक के अनेकों दुष्प्रभावों को दूर कर ज्ञान का भंडार भर देता है, इसलिए एक अच्छे शिक्षक की कुंडली में बृहस्पति (गुरू) की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

जैसे कि दर्शन शास्त्र के महा-नायक डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की कुंडली में गुरू चतुर्थ भाव में स्थित होकर कर्म भाव को पूर्ण दृष्टि से देख रहे हैं, केन्द्र में स्थित बलवान गुरू ने इन्हें शिक्षकों का सर्वकालिक प्रतिनिधि बनाया और देश आज भी इनके जन्म-दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है।

जन्मकुण्डली में गुरू शुभ एवं बलवान हो अथवा गुरू ग्रह द्वारा गजकसेरी योग का सृजन हो रहा हो, या पंचमहापुरूष योग हो अथवा ग्रह स्थिति, ग्रह योग होने पर व्यक्ति शिक्षा के क्षेत्र में पदार्पण करता है। शिक्षक शिक्षण प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है। शिक्षक के बिना शिक्षा की प्रक्रिया सफल रुप से नहीं चल सकती। सामान्यतः एक अच्छे अध्यापक में निम्नलिखित गुणों का होना अति आवश्यक है जो इस प्रकार हैं।
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शिक्षक में मुख्य रुप से 4 गुण
1.शैक्षिक गुण /योग्यताएं

2.व्यावसायिक गुण

3.व्यक्तित्व संबंधी गुण

  1. संबंध स्थापित करने का गुण

कुंडली में शिक्षक बनने के ज्योतिषीय योग
ज्योतिष शास्त्र में अध्यापन क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिये कुंडली में गुरु तथा बुध का बली होना आवश्यक है, क्योंकि गुरु ज्ञान के कारक माने जाते हैं तथा बुध बुद्धि के कारक होते हैं। कुंडली में इन दोनों ग्रहों की शुभ स्थिति तथा इनका लग्न, धन, विद्या, रोग व सेवा, कर्म, लाभ स्थान से किसी भी प्रकार युति, दृष्टि संबंध स्थापित होने पर व्यक्ति को अध्यापन क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

  1. पंचमेश बली होकर पंचम भाव या केन्द्र में स्थित हो तो जातक अध्यापक होता है।
  2. बुध स्वराशि में या सिंह राशि में हो और पंचम भाव में बुधादित्य योग हो तो जातक अध्यापक होता है।
  3. पंचमेश पंचम भाव में और बुध व गुरु की युति एकादश भाव में हो तो जातक डिग्री कॉलिज या विश्‍वविद्यालय में शिक्षक होता है।
  4. बुध और गुरु सप्तम या दशम भाव व सूर्य द्वितीय भाव में हो तो जातक शिक्षक होता है।
  5. शुक्र सातवें, सूर्य पांचवें एवं गुरु दसवें भाव में हो तो जातक शिक्षक बनता है।
  6. – यदि कुंडली में हंस योग, भद्र योग उपस्थित हो तो व्यक्ति अध्यापन क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।
  7. – गुरु व बुध की केंद्र में स्थिति, दोनों का एक दूसरे से युति व दृष्टि संबंध हो तो जातक शिक्षक होता है।
  8. – फलदीपिका के अनुसार यदि दशमेश के नवमांश का अधिपति गुरु हो तो व्यक्ति शिक्षा क्षेत्र में करियर बनाता है।
  9. – लग्न तथा चंद्र कुंडली से लग्नेश, पंचमेश, दशमेश का संबंध गुरु तथा बुध से बनने पर अध्यापन क्षेत्र द्वारा जीविका अर्जन होती है।
  10. – सूर्य का धन स्थान, पंचम, सेवा, कर्म में गुरु व बुध से संबंध सरकारी अध्यापन क्षेत्र में सेवा प्राप्त करने में सफलता प्रदान करता है।
  11. – यदि कुंडली में गजकेसरी योग उपस्थित हो तथा उसका संबंध धन, पंचम, दशम स्थान से बन रहा हो तो ऐसे जातकों को शिक्षा क्षेत्र में सफलता मिलती है।
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार देखा जाए तो हर व्यक्ति का जन्म होते ही वह अपने प्रारब्ध के चक्र से बंध जाता है और ज्योतिषशास्त्र द्वारा निर्मित जन्म कुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को प्रकट करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं बारह राशि व नवग्रह द्वारा ही संचालित होती हैं। इन ग्रहों का आपके जीवन पर आने वाले समय में कैसा प्रभाव पड़ेगा इसके बारे में विस्तृत जवाब जानने के लिए अभी आप भी कर्ज़ की समस्या से परेशान हैं, और उससे जुड़ा कोई व्यक्तिगत उपाय, निवारण जानना चाहते हों या इससे जुड़े किसी सवाल का जवाब चाहिए हो तो
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