धर्ममध्य प्रदेश

पितृ पक्ष का महत्व पौराणिक कथाओं के अनुसार

पितृ पक्ष का महत्व पौराणिक कथाओं के अनुसार किसी भी पूजा से पहले इंसानों को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिए। कहा जाता है अगर आपके पितृ आपसे प्रसन्न होते हैं तो देवता भी अवश्य प्रसन्न होते हैं। यही वजह है कि हिन्दू धर्म के अनुसार जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजुर्गों का सम्मान और उनकी मृत्यु के बाद श्राद्ध कर्म किए जाने का बेहद महत्व बताया गया है। माना जाता है कि अगर विधि अनुसार किसी पितृ का तर्पण ना किया जाए तो उन्हें मौत के बाद भी मुक्ति नहीं मिलती है। और उनकी आत्मा मृत्यु लोक में इधर-उधर भटकती रहती है। हिंदू धर्म में अनेकों रीति-रिवाज, व्रत-त्यौहार, और परंपराएं मानी जाती हैं। हिंदुओं में किसी भी इंसान के जन्म लेने से लेकर उसकी मृत्यु तक अनेकों प्रकार के रीति-रिवाज़ों का पालन किए जाने की मान्यताएं हैं। इंसान के अंत्येष्टि को उसका अंतिम संस्कार माना गया है लेकिन, अंतिम संस्कार के बाद भी कुछ ऐसे काम होते हैं जिन्हें मृतक के परिवार के लोग करते हैं जिससे मृत आदमी की आत्मा को शांति मिल सके। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक काम माना गया है। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार यूँ तो हर माह की अमावस्या तिथि को श्राद्ध किया जा सकता है लेकिन, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर अश्विन मास की अमावस्या तक श्राद्ध करने और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए निर्धारित किया गया है। इस समय के दौरान लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं जिससे हमारे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। पितृ पक्ष 2020 1 से 17 सितंबर पूर्णिमा श्राद्ध – 1 सितंबर 2020 सर्वपितृ अमावस्या – 17 सितंबर 2020 पितृपक्ष का ज्योतिषीय कारण सिर्फ हिंदू धर्म के अनुसार ही नहीं ज्योतिष शास्त्र में भी पितृदोष को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। कहते हैं जब कोई जातक किसी सफलता के बेहद नज़दीक पहुँचकर भी सफलता को नहीं पाता है, या संतान उत्पत्ति में उनकी जीवन में परेशानी आ रही होती है, या उनको बार-बार धन की हानि हो रही हो तो ऐसी प्रबल संभावना है कि उस जातक की कुंडली में पितृदोष हो सकता है। इस वजह से भी मुक्ति के लिए पितरों की शांति बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। जाने किस दिन किया जाता है पितृ पक्ष? वैसे तो प्रत्येक माह की अमावस्या के दिन पितरों की शांति के लिए श्राद्ध किया जा सकता है लेकिन पितृपक्ष में श्राद्ध करने का अलग ही महत्व बताया गया है। पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए पितृपक्ष में उनका श्राद्ध करना चाहिए। हालांकि अगर आपको अपने पितृ की मृत्यु की तिथि के बारे में सही-सही जानकारी नहीं हो तो अश्विनी अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध किया जा सकता है। इसके अलावा अगर किसी इंसान की मृत्यु समय से पहले जैसे किसी दुर्घटना या सुसाइड की वजह से अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। पिता के श्राद्ध के लिए अष्टमी तिथि चुनी गई है, और माता की श्राद्ध के लिए नवमी तिथि निर्धारित की गई है। श्राद्ध पक्ष में पितरों की शांति के लिए कैसे किया जाता है श्राद्ध? श्राद्ध कर्म ऐसे कर्म को कहा जाता है जिसमें परिवार के दिवंगत व्यक्तियों के लिए लोग श्रद्धा प्रकट करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए पूजा पाठ इत्यादि करते हैं। पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा से लेकर अश्विन माह की अमावस्या तक श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध करने की विधि अब सवाल उठता है कि कैसे श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है? हिंदू धर्म में पितरों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष की प्राप्ति की कामना के लिए उनके लिए श्राद्ध करना बेहद आवश्यक माना गया है। इसके लिए श्राद्ध करने की एक विधि निर्धारित की गई है। अगर पूरी विधि विधान से श्राद्ध किया जाता है तो पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और, अगर ऐसा नहीं होता है तो हमारे पूर्वजों की आत्मा आजीवन अतृप्त रहती है। मान्यता है कि श्राद्ध कर्म किसी विद्वान ब्राह्मण के हाथों ही करवाना चाहिए। इसके अलावा इस दौरान अगर आप किसी गरीब, या किसी ज़रूरतमंद की सहायता भी कर सके तो उससे भी बहुत पुण्य मिलता है। श्राद्ध के लिए बनने वाले खाने को कुत्तों को, और अन्य पशु-पक्षियों में भी अवश्य डालना चाहिए। श्राद्ध करने के लिए इंसान की तिथि का ज्ञान होना बेहद आवश्यक है। जिस इंसान की मृत्यु जिस तिथि को हुई होती है उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है। लेकिन कभी-कभी हमें तिथि का ज्ञात नहीं होता है ऐसी स्थिति में अश्विन अमावस्या के दिन श्राद्ध कर्म किया जाना निर्धारित किया गया है। क्योंकि इस दिन को सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है। श्राद्ध कर्म करने वाले दिन व्रत रखना चाहिए, और खीर आदि पकवानों से ब्राह्मणों को भोज करवाना चाहिए। श्राद्ध कर्म करने वाले दिन व्रत रखना चाहिए, और खीर आदि पकवानों से ब्राह्मणों को भोज करवाना चाहिए। श्राद्ध की पूजा दोपहर के समय शुरू की जानी चाहिए। इस दिन हवन किया जाता है। योग्य ब्राह्मण की मदद से मंत्र उच्चारण और पूजा की जाती है। इसके बाद जो भी पकवान भोग लगाया जाना है उसमें से एक हिस्सा गाय, काले कुत्ते, कौवे आदि को दिया जाता है। इस दौरान आपको अपने पितरों का स्मरण करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मण देवता को भोज करवाना चाहिए और भोजन के बाद उन्हें दान दक्षिणा भी देना चाहिए। मान्यता है कि इस तरह से विधि विधान से जो भी श्राद्ध पूजा करता है उस जातक को पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही इस बात से प्रसन्न होकर पितृ आपके घर परिवार में जीवन में सुख समृद्धि और ख़ुशियों का आशीर्वाद भी देते हैं। पितृपक्ष के दौरान क्या करें और क्या ना करें हिंदू संस्कृति में पितृपक्ष के दौरान पितरों की पूजा और पिंड दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पिंडदान, तर्पण, और ब्राह्मणों को भोजन कराने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और अपने पुत्र-पौत्रों को सुखी जीवन का आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष के दौरान ध्यान रखें ये बातें पितृपक्ष के बारे में ऐसी मान्यता है कि इन 16 दिनों की अवधि में सभी पूर्वज अपने पुत्र पौत्रों को आशीर्वाद देने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। पितरों को प्रसन्न करने के लिए इस तरह तर्पण, श्राद्ध, और पिंडदान इत्यादि किया जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि जो लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान नहीं करते हैं उन्हें पितृ ऋण और पितृ दोष जैसे दोषों का सामना करना पड़ता है। श्राद्ध पक्ष के दौरान इन बातों का ध्यान अवश्य रखें श्राद्ध कर्म के अनुष्ठान में परिवार का सबसे बड़ा सदस्य अवश्य शामिल होना चाहिए। पितरों को श्राद्ध देने से पहले स्नान करके साफ कपड़े पहन लें। इसके बाद कुश घास से बनी अंगूठी धारण करें। पिंडदान के एक भाग के रूप में जौ के आटे, तिल, और चावल से बने एक गोलाकार पिंड को भेंट करें। पूर्वजों के श्राद्ध के लिए जो भी भोजन तैयार किया जाता है उसे कौवा को भी अर्पित करें, क्योंकि कौवों को यम देवता का दूत माना गया है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन अर्पित करें। पितृ पक्ष मंत्र का जाप करें। “ये बान्धवा बान्धवा वा ये नजन्मनी बान्धवा” ते तृप्तिमखिला यन्तुं यश्र्छमतत्तो अलवक्ष्छति। ” श्राद्ध पक्ष के दौरान भूल से भी ना करें यह काम हिंदू धर्म में श्राद्ध पितृपक्ष के दौरान कोई भी शुभ काम वर्जित बताया गया है। इस दौरान कोई भी नया वाहन या सामान नहीं खरीदना चाहिए। इसके अलावा इस दौरान मांसाहारी भोजन, शराब, तंबाकू, धूम्रपान, इत्यादि का सेवन भी नहीं करना चाहिए। श्राद्ध कर्म करने वाले इंसान को अपने नाखून नहीं काटने चाहिए। इसके अलावा उन्हें इस दौरान अपने दाढ़ी और बाल भी नहीं बनाने चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इन 16 दिनों में हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं इसलिए इस दौरान अगर आपके दरवाज़े पर कोई भी पशु या पक्षी या इंसान आता है तो भूल से भी उसका अनादर ना करें बल्कि, उन्हें भोजन कराएं और सम्मान दे कर विदा करें। पितृ पक्ष में कुछ चीजें खाने को मना की गई हैं जैसे, चना, दाल, जीरा, काला नमक, लौकी, खीरा, सरसों का साग। श्राद्ध कर्म शाम, रात, सुबह या अंधेरे के दौरान नहीं किया जाना चाहिए। पितृपक्ष में गायों, ब्राह्मणों, कुत्तों, चीटियों, बिल्लियों और ब्राह्मणों को भोजन करवाने की बड़ी मान्यता बताई गई है। जाने किस दिन करें किस का श्राद्ध जिन जातकों की अकाल मृत्यु हुई होती है उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करना चाहिए। विवाहित स्त्रियों का श्राद्ध नवमी तिथि को करना चाहिए। नवमी तिथि को माता के श्राद्ध के लिए भी शुभ माना जाता है। सन्यासी पितरों का श्राद्ध द्वादशी तिथि को किया जाता है। नाना नानी का श्राद्ध अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को करना चाहिए। अविवाहित जातकों का श्राद्ध पंचमी तिथि को करना चाहिए। सर्वपितृ अमावस्या यानी अश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन उन सभी लोगों का श्राद्ध किया जाना चाहिए जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात ना हो। आप भी कर्ज़ की समस्या से परेशान हैं, और उससे जुड़ा कोई व्यक्तिगत उपाय, निवारण जानना चाहते हों या इससे जुड़े किसी सवाल का जवाब चाहिए हो तो अभी इस नंबर पर आप संपर्क कर सकते हैं l 9302409892

🌷 श्राद्ध विशेष 🌷
पूर्वजों को पितर पक्ष में इस मंत्र के द्वारा सूर्य भगवान को अर्ध्य देने से यमराज प्रसन्न होकर पूर्वजों को अच्छी जगह भेज देते हैं ।
🌷 ॐ धर्मराजाय नमः ।
🌷 ॐ महाकालाय नमः ।
🌷 ॐ म्रर्त्युमा नमः ।
🌷 ॐ दानवैन्द्र नमः ।
🌷 ॐ अनन्ताय नमः ।
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🌷 पितृ पक्ष 🌷


🙏🏻 धर्म ग्रंथों के अनुसार, विधि-विधान पूर्वक श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। वर्तमान समय में देखा जाए तो विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करने में धन की आवश्यकता होती है। पैसा न होने पर विधिपूर्वक श्राद्ध नहीं किया जा सकता। ऐसे में पितृ दोष होने से कई प्रकार की समस्याएं जीवन में बनी रहती हैं। पुराणों के अनुसार, ऐसी स्थिति में पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर कुछ साधारण उपाय करने से भी पितर तृप्त हो जाते हैं।
न कर पाएं श्राद्ध तो करें इनमें से कोई 1 उपाय, नहीं होगा पितृ दोष
🙏🏻 जिस स्थान पर आप पीने का पानी रखते हैं, वहां रोज शाम को शुद्ध घी का दीपक लगाएं। इससे पितरों की कृपा आप पर हमेशा बनी रहेगी। इस बात का ध्यान रखें कि वहां जूठे बर्तन कभी न रखें।
🙏🏻 सर्व पितृ अमावस्या के दिन चावल के आटे के 5 पिंड बनाएं व इसे लाल कपड़े में लपेटकर नदी में बहा दें।
🙏🏻 गाय के गोबर से बने कंडे को जलाकर उस पर गूगल के साथ घी, जौ, तिल व चावल मिलाकर घर में धूप करें।
🙏🏻 विष्णु भगवान के किसी मंदिर में सफेद तिल के साथ कुछ दक्षिणा (रुपए) भी दान करें।
🙏🏻 कच्चे दूध, जौ, तिल व चावल मिलाकर नदी में बहा दें। ये उपाय सूर्योदय के समय करें तो अच्छा रहेगा।
🙏🏻 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन कराएं या सामग्री जिसमें आटा, फल, गुड़, सब्जी और दक्षिणा दान करें।
🙏🏻 श्राद्ध नहीं कर सकते तो किसी नदी में काले तिल डालकर तर्पण करें। इससे भी पितृ दोष में कमी आती है।
🙏🏻 श्राद्ध पक्ष में किसी विद्वान ब्राह्मण को एक मुट्ठी काले तिल दान करने से पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।
🙏🏻 श्राद्ध पक्ष में पितरों को याद कर गाय को हरा चारा खिला दें। इससे भी पितृ प्रसन्न व तृप्त हो जाते हैं।
🙏🏻 सूर्यदेव को अर्ध्य देकर प्रार्थना करें कि आप मेरे पितरों को श्राद्धयुक्त प्रणाम पहुँचाए और उन्हें तृप्त करें।
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