जरा हटकेमध्य प्रदेश

07 घंटे का शोषण झेलने के लिए मजबूर हुए मजदूर

( यदुवंशी ननकू यादव)

सतना :कोरोनावायरस महामारी का दौर चलने के बाद भी गरीब मजदूरों को शोषण का शिकार बनाने का काम पूरी हठधर्मिता के साथ ठेकेदारों का समूह बराबर कर रहा है। नागरिक आपूर्ति निगम, एफसीआई सहित अन्य पार्टियों का खाद्यान्न, खाद सहित अन्य सामग्रियों का बंफर stock मालगाड़ियों से सतना रेलवे माल गोदाम के प्लेटफार्म पर उतरता है। रेलवे माल गोदाम में ठेकेदारों द्वारा गरीब मजदूरों का ऐलानिया शोषण करते हैं। मजेदार बात यह है कि आठ घंटे की मजदूरी का भुगतान करने वाले तथाकथित ठेकेदारों की मंडली गरीब मजदूरों से पूरे पंद्रह घंटे काम लिया जाता है। रोज रेलवे माल गोदाम में सैकड़ों की संख्या में नजर आने वाले मजदूरों का तकरीबन सात घंटे तक निरंतर ठेकेदार शोषण करता है। कोरोनावायरस महामारी के इस दौर में टोटल लाक डाउन के कारण अच्छे अच्छों की जिंदगी में महासंकट जैसे हालात निर्मित हो गये। रोज कमाने रोज खाने वाले मजदूरों की हालत सबसे ज्यादा खराब हो गई। रेलवे माल गोदाम में लोडिंग अनलोडिंग करवाने वाले ठेकेदारों का समूह योजनाबद्ध तरीके से मजदूरों का शोषण करने का काम पूरी जिम्मेदारी के साथ करते हैं। इन दिनों सतना रेलवे माल गोदाम में यूरिया की आवाक बराबर हो रही है। इसकी लोडिंग अनलोडिंग करवाने के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों को लगाया गया है। सुबह आठ बजे से माल गोदाम में मजदूरों का काम शुरू हो जाता है। नियमानुसार ठेकेदार केवल आठ घंटे ही किसी भी मजदूर से काम ले सकता है। रेलवे माल गोदाम में सुबह आठ बजे से रात 11 बजे तक मजदूरों से काम लिया जाता है। गरीबी जैसी महामारी से घिरे गरीब मजदूरों के लिए रोज कमाने रोज खाने जैसी स्थिति ठप्प होने के कारण आर्थिक और मानसिक तनाव एक जटिल समस्या बन गई थी। कोरोना काल में भी मजदूरों को राहत देने का काम न करते हुए रेलवे माल गोदाम में ठेकेदारों का समूह मजदूरों का शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं।

रेलवे जमीन पर मजदूरों का शोषण, जिम्मेदार मौन
एक तरफ हमारे देश में केंद्र की मोदी सरकार और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार मजदूरों के नाम पर योजनाएं चलाकर उनके जीवन स्तर में सुधार करने का निरंतर प्रयास कर रही हैं, इसके बाद भी गरीब मजदूरों की हालत नहीं सुधर रही है। भारतीय रेलवे की जमीन पर सैकड़ों मजदूरों का आर्थिक और शारीरिक शोषण डंके की चोट पर किया जाता है। लोडिंग अनलोडिंग करवाने वाले ठेकेदारों के शोषण को झेलना गरीब मजदूरों का नसीब बन गया है। केंद्र और राज्य में सरकारें बदलती रही, हर तरफ बदलाव होता रहा लेकिन गरीब मजदूरों के मामले में किसी तरह का सुधार सामने नहीं आया है। रेलवे पुलिस और जीआरपी के परस्पर संरक्षण में ही ठेकेदारों का समूह सैकड़ों मजदूरों का शोषण करते हैं। पुलिस व्यवस्था को कैसे मैनेज किया जाता है, यह कला स्थानीय ठेकेदार बराबर समझते हैं। आरपीएफ और जीआरपी का मैनेजमेंट सेट करके ही परिवहन ठेकेदार मजदूरों का शोषण करने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं।‌ आखिर इक्कीसवीं सदी के इस दौर में गरीब मजदूरों को शोषण से बचाने के लिए क्या कभी हमारे देश में कुछ होगा या नहीं। पश्चिम मध्य रेलवे जोन के महाप्रबंधक और जबलपुर रेल मंडल के डीआरएम जैसे अधिकारियों के लिए मजदूरों की उपयोगिता समझ से परे है। जिला प्रशासन पर जिम्मेदारियों का इतना दबाव है कि बहुत सी जनहितैषी योजनाओं का दम ही निकल जाता है। केंद्र सरकार ने श्रम विभाग को तैनात कर यह जिम्मेदारी सौंपी है कि कहीं पर भी मजदूरों का शोषण नहीं होना चाहिए। श्रम कानून के तहत मजदूरों का शोषण करने वालों के खिलाफ यदा-कदा ही कार्रवाई उजागर होती है।

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