धर्ममध्य प्रदेश

19 सालों बाद अधिक-मास का यह योग

19 सालों बाद अधिक-मास का यह योग इस बार 18 सितम्बर 2020, शुक्रवार व उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र से शुरू होने जा रहा है जो कि, अपने आप में एक शुभ योग है। ऐसा योग उत्तम फल व सुख – समृद्धि और शीघ्र फल देने वाला माना गया है।

इसके अलावा जान लीजिये कि किस चीज़ की ख़रीददारी के लिए कौन सा दिन होगा शुभ

ध्रुव स्थिर मुहूर्त

18 और 26 सितंबर 2020
7 और 15 अक्टूबर 2020 और सभी रविवार
पढ़ाई से संबंधित चीज़ेंनिवेश सगाई-रोका से जुड़े कपड़े, ख़रीददारी और गहने इसके अलावा शपथ ग्रहण और पद-भार ग्रहण के लिए ये दिन शुभ

चर-चल मुहूर्त

20, 27, 28 29 सितंबर 2020 10 अक्टूबर 2020और महीने के सारे सोमवार कोई भी वाहन खरीदने या बुक करने के लिए दिन शुभ

उग्र-क्रूर मुहूर्त

25 और 30 सितंबर 2020 5, 13, 14, अक्टूबर 2020
और महीने के सभी मंगलवार कोई भी शस्त्र की ख़रीददारी या बुकिंग के लिए दिन शुभ

मिश्र-साधारण मुहूर्त

21 सितंबर 2020 6 अक्टूबर 2020 और महीने के सभी बुधवार किसी भी मांगलिक काम के लिए किसी स्थान की बुकिंगधर्मशाला की बुकिंग कोई भी नया व्यापारिक सौदा करने के लिए दिन शुभ

क्षिप्र लघु मुहूर्त

19 सितंबर 2020 4 और 11 अक्टूबर 2020 और सभी गुरुवार वाहन खरीदने की बुकिंग के लिए दिन शुभ

मृदु मैत्र मुहूर्त

19 और 22 सितंबर 2020 2, 3, 8 अक्टूबर 2020 नए रिश्ते करने के लिए नए कपड़ों की खरीद नए गहने-आभूषणों की खरीद विलासिता से जुड़े किसी भी सामान की खरीद या बुकिंग के लिए दिन शुभ

ख़रीददारी के लिए शुभ योग
सर्वार्थसिद्धि योग : सभी कामों में सफलता प्राप्ति के लिए और हर मनोकामना की पूर्ति के लिए इस योग को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।

किस-किस दिन है सर्वार्थसिद्धि योग : 26 सितंबर-2020, 1 अक्टूबर-2020, 4 अक्टूबर-2020, 6 अक्टूबर-2020, 7 अक्टूबर-2020, 9 अक्टूबर-2020, 11 अक्टूबर-2020, 17 अक्टूबर-2020

द्विपुष्कर योग : ज्योतिष की दुनिया में द्विपुष्कर योग को बेहद ही खास माना गया है। मान्यता है कि इस योग में जो कोई भी काम किया जाता है उसका दोगुना फल प्राप्त होता है।

किस-किस दिन है द्विपुष्कर योग : 19 सितम्बर 2020, 27 सितंबर 2020

अमृतसिद्धि योग : मान्यता है कि अमृतसिद्धि योग में जो कोई भी काम किया जाये उसका फल दीर्घकालीन होता है।

किस दिन है अमृतसिद्धि योग : 2 अक्टूबर 2020

पुष्य नक्षत्र : इस वर्ष अधिक मास में दो पुष्य नक्षत्र भी पड़ रहे हैं। इस दिन कोई भी आवश्यक शुभ काम किया जा सकता है।

किस-किस दिन है पुष्य नक्षत्र : 10 अक्टूबर 2020- रवि पुष्य, 11 अक्टूबर 2020- सोम पुष्य

महायोग अधिकमास में भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी जी की भी करे आराधना
आमतौर पर अधिकमास में हिंदू श्रद्धालु व्रत- उपवास, पूजा- पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते हैं। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार अधिकमास के दौरान यज्ञ- हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इसीलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है।

ऐसा माना जाता है कि, अधिक मास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले साधकों को भगवान विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते हैं व सभी पापों का दमन करते हैं, और भक्त की समस्त इच्छाएं पूरी करते हैं। परन्तु इस बार अधिमास में भगवान विष्णु की ही पूजा नहीं बल्कि माँ लक्ष्मी जी की पूजा करने से भी अजेय फल प्राप्त होगा, क्योंकि आश्विन माह की पूर्णिमा को देवी लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर अवतरित हुईं थीं। इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है, इसलिए आश्विन माह देवी लक्ष्मी जी की आराधना का माना गया है।

इस प्रकार इस महायोग में धन- लक्ष्मी की प्राप्ति व सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए इस मास भगवान विष्णु जी के साथ-साथ देवी लक्ष्मी जी की आराधना करने से हर वैभव व अजेय की प्राप्ति होगी।

अधिकमास में न करें ये मांगलिक कार्य
हिंदू धर्म में अधिकमास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। माना जाता है कि, अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन होता है, इसलिए इस मास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृह-प्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते हैं। मलिन मानने के कारण ही इस मास का नाम मल-मास पड़ गया है।

हालाँकि इस वर्ष पड़ने वाले अधिक मास में ख़रीददारी इत्यादि के लिए कई दिन शुभ हैं। इन 25 से अधिक दिनों के दौरान आप कपड़े, गहने, प्रोपर्टी, वाहन इत्यादि वस्तुओं की खरीद कर सकते हैं। जानते हैं उन शुभ योगों के बारे में जिनमें ख़रीददारी की जा सकती है
अधिक मास का पौराणिक महत्व
हिंदू धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव पंचमहाभूतों से मिलकर बना है। इन पंचमहाभूतों में जल, अग्नि, आकाश, वायु और पृथ्वी सम्मिलित हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप ही ये पांचों तत्व प्रत्येक जीव की प्रकृति न्यूनाधिक रूप से निश्चित करते हैं। अधिकमास में समस्त धार्मिक कर्मों, चिंतन- मनन, ध्यान, योग आदि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित इन पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। इस पूरे मास में अपने धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयासों से प्रत्येक व्यक्ति अपनी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति और निर्मलता के लिए उद्यत होता है। इस तरह अधिकमास के दौरान किए गए प्रयासों से व्यक्ति हर तीन साल में स्वयं को बाहर से स्वच्छ कर परम निर्मलता को प्राप्त कर नई उर्जा से भर जाता है, और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इस दौरान धार्मिक कर्मों, चिंतन- मनन, ध्यान, योग आदि किए गए इन प्रयासों से जन्म कुंडली में अनेकों दोषों का भी निराकरण हो जाता है और जीवन में हो रही उथल-पुथल को दूर कर जातक को सुखमय जीवन बनाने में योगदान प्रदान करता है।

अधिक मास’ कब व कैसे होता है?
सौर वर्ष और चन्द्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चन्द्र-मास की वृद्धि होती है। इसी को अधिक मास या अधिमास या मलमास कहते हैं। सौर-वर्ष का मान 365 दिन, 15 घड़ी, 22 पल और 57 विपल हैं। जबकि चांद्रवर्ष 354 दिन, 22 घड़ी, 1 पल और 23 विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष 10 दिन, 53 घटी, 21 पल (अर्थात लगभग 11 दिन) का अंतर पड़ता है। इस अंतर में समानता लाने के लिए चन्द्र-वर्ष 12 मासों के स्थान पर 13 मास का हो जाता है। वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि जिस चंद्र-मास में सूर्य-संक्रांति नहीं पड़ती, उसी को “अधिक मास” की संज्ञा दे दी जाती है।

ऐसा माना जाता है कि अधिकमास में किए गए दान–पुण्य व जप-तप, पूजा-पाठ से 10 गुना अधिक फल प्राप्त होता है। यही वजह है कि, श्रद्धालु-जन अपनी पूरी श्रद्धा और शक्ति के साथ इस मास में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुट जाते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि यदि यह माह इतना ही प्रभावशाली और पवित्र है, तो यह हर तीन साल में क्यों आता है? आखिर क्यों और किस कारण से इसे इतना पवित्र माना जाता है? इस एक माह को तीन विशिष्ट नामों से क्यों पुकारा जाता है?

अधिक मास’ कब व कैसे होता है?
सौर वर्ष और चन्द्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चन्द्र-मास की वृद्धि होती है। इसी को अधिक मास या अधिमास या मलमास कहते हैं। सौर-वर्ष का मान 365 दिन, 15 घड़ी, 22 पल और 57 विपल हैं। जबकि चांद्रवर्ष 354 दिन, 22 घड़ी, 1 पल और 23 विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष 10 दिन, 53 घटी, 21 पल (अर्थात लगभग 11 दिन) का अंतर पड़ता है। इस अंतर में समानता लाने के लिए चन्द्र-वर्ष 12 मासों के स्थान पर 13 मास का हो जाता है। वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि जिस चंद्र-मास में सूर्य-संक्रांति नहीं पड़ती, उसी को “अधिक मास” की संज्ञा दे दी जाती है।

ऐसा माना जाता है कि अधिकमास में किए गए दान–पुण्य व जप-तप, पूजा-पाठ से 10 गुना अधिक फल प्राप्त होता है। यही वजह है कि, श्रद्धालु-जन अपनी पूरी श्रद्धा और शक्ति के साथ इस मास में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुट जाते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि यदि यह माह इतना ही प्रभावशाली और पवित्र है, तो यह हर तीन साल में क्यों आता है? आखिर क्यों और किस कारण से इसे इतना पवित्र माना जाता है? इस एक माह को तीन विशिष्ट नामों से क्यों पुकारा जाता है?
नाम: ज्योतिषचार्य निधिराज त्रिपाठी

कुंडली परामर्श : 501/-

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार देखा जाए तो हर व्यक्ति का जन्म होते ही वह अपने प्रारब्ध के चक्र से बंध जाता है और ज्योतिषशास्त्र द्वारा निर्मित जन्म कुंडली हमारे इसी प्रारब्ध को प्रकट करती है। हमारे जीवन में सभी घटनाएं बारह राशि व नवग्रह द्वारा ही संचालित होती हैं। इन ग्रहों का आपके जीवन पर आने वाले समय में कैसा प्रभाव पड़ेगा इसके बारे में विस्तृत जवाब जानने के लिए अभी आप भी कर्ज़ की समस्या से परेशान हैं, और उससे जुड़ा कोई व्यक्तिगत उपाय, निवारण जानना चाहते हों या इससे जुड़े किसी सवाल का जवाब चाहिए हो तो
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