सतधारा के मेला में कोरोना का ग्रहण,सिर्फ स्नान को रहेगी छूट

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सिहोरा:तहसील सिहोरा के सतधारा मेला के विषय मे कौन नहीं जानता जिले भर में मशहूर इस मेले को देखने दूर दूर से लोग यहां जाते थे लेकिन इस बार सतधारा में कोरोना का ग्रहण लग गया है,

सात धाराओं से सतधारा पड़ा है नाम

भगवान सूर्य के अयन परिवर्तन का समय करीब आ रहा है वह मकर राशि में प्रवेश करने के साथ-साथ उत्तरायण हो जाएंगे सूर्य देव के उत्तरायण होने की खुशी में मेलों के आयोजन एवं पवित्र नदी में स्नान दान की परंपरा सदियों से चली आ रही है किंतु इस वर्ष कोरोना संक्रमण के चलते प्रशासन की गाइडलाइन के अनुसार बड़े धार्मिक आयोजनों पर बंदिश होने से बड़े मेलों का आयोजन नहीं हो सकेगा मेलो को प्रतिबंधित किए जाने से क्षेत्रीय लोगों के साथ-साथ व्यापारियों में भी निराशा व्याप्त है
काष्ठ कला के लिए मशहूर सप्तदिवसीय सतधारा मेला
स्नान दान की परंपरा के महापर्व पर आयोजित जिले का ऐतिहासिक मेला का आयोजन कोरोना संक्रमण के चलते इस वर्ष आयोजित नहीं हो सकेगा उल्लेखनीय है कि हजारों वर्ष पूर्व से मकर संक्रांति के अवसर पर 14 जनवरी से कुम्ही सतधारा मे भरने वाले जिले के सबसे बड़े धार्मिक मेले पर प्रशासन ने रोक लगा दी है
प्राचीन मान्यता है कि सप्त ऋषि यों की तपोभूमि सतधारा घाट में हिरण नदी की सात धारा बहा करती थी जिसमें सदियों पूर्व सप्त ऋषि यों ने स्नान कर तप किया था उसी समय से आस्था के केंद्र बन चुके सतधारा घाट में मकर संक्रांति के पर्व पर धार्मिक मेले के आयोजन पर हजारों श्रद्धालु पुण्य सलिला में स्नान, दान कर भक्तगण पुण्य लाभ अर्जित करते चले आ रहे हैं साथ ही घाट पर बने मंदिर कुंडेश्वर महादेव के दर्शन कर मेले का लुफ्त उठाते हैं
वर्तमान में सतधारा मेले का आयोजन जनपद पंचायत सिहोरा के तत्वाधान में किया जाता रहा है जिसमें जिले के साथ अन्य जिले प्रदेश के व्यापारी मेले में हिस्सा लेकर आर्थिक लाभ प्राप्त करते थे वहीं ग्रामीण मेले का लुफ्त उठाने के साथ-साथ कपड़ा बर्तन सहित अन्य उपयोगी वस्तु के अलावा वैवाहिक समारोह तक की खरीदारी कर लेते थे
लकड़ी के सामान के लिए मशहूर
ग्रामीणों का कहना है कि भले ही ग्रामीण उपयोग की सामग्री मेले से तय करते थे किंतु जिले के दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले लोगों की पहली पसंद लकड़ी के सामान फर्नीचर आदि हुआ करते थे मेले में मिलने वाले पटा बिल्ला सहित सागौन के खिड़की दरवाजे सोफा पलंग की अपनी एक अलग पहचान है
क्षेत्रीय जन मायूस
प्रशासन द्वारा मेले पर रोक लगाए जाने से स्थानीय लोग मायूस हैं सैकड़ों ग्राम के लोग महीनों पहले से मेले का इंतजार करते थे वहीं व्यापारी भी मेले में दुकान लगाने स्टॉक रेडी करते थे किंतु को रोना की भेंट चढ़े सतधारा मेला ने व्यापारियों के समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न कर दिया है
*गंज ताल का मेला*
जनश्रुतियों के अनुसार 800 साल पहले जब यहां गोंड राजाओं की हुकूमत थी उस समय राजा निजाम शाह के एक मंत्री विश्राम सिंह ने गंजताल का निर्माण कराया था।बताया जाता है कि काफी गहराई तक खोदने के बाद भी जब उसमें पानी नहीं आया तो वे निराश हो गए। एक रात जब वे गहरी नींद में थे तभी स्वप्न में किसी ने उनसे कहा कि गढ़ा राज्य के ग्वाल और ग्वालिन के जोड़े को यहां बुलाया जाए तभी तालाब में पानी आयेगा विश्राम सिंह ने अपने सिपाहियों को भेजकर ग्वाल-ग्वालिन को गंजताल बुलाया। वे दोनों जैसे ही सूखे तालाब के अंदर पहुंचे तो अचानक तालाब से बड़ी मात्रा में जल राशि प्रवाहित होने लगी। जलराशि इतनी ज्यादा थी कि ग्वाल ग्वालिन उसी में समा गए और देखते ही देखते तालाब लबालब हो गया। बताया गया है कि आज तक कभी यह तालाब सूखा नहीं। तालाब के पास ही महादेव का विशाल मंदिर भी बनवाया गया था जो अब रखरखाव न होने से क्षतिग्रस्त हो रहा है।

मेेले में आते हैं 50 गांव के लोग
इस तालाब पर ग्वाल ग्वालिन की याद में हर साल दो दिन का मेला लगता है जिसमें आसपास के करीब 50 गांव के लोग शामिल होते हैं। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में विराजमान शिव पिंडी के दर्शन से लोगों के कष्ट दूर होते हैं। मकर संक्रांति और शिवरात्रि पर बड़ी संख्या में लोग शिवार्चन के लिए यहां आते हैं। गंजताल से लगी करीब 100 एकड़ जमीन है जो गोपाल लाल ट्रस्ट हनुमानताल को दी गई है।
*मिट्टी के बर्तनों के लिए मशहूर दुनाय मेला*
सिहोरा से लगभग 5 किलोमीटर दूर हिरण नदी की एक छोटी पहाड़ी के कारण दो भागों में विभक्त होकर बहने से बने रमणीय स्थल बनाए में भी प्रतिवर्ष संक्रांति पर्व पर मेले का आयोजन किया जाता है दिन आए मेले में बिकने आने वाले मिट्टी के बरतन मैं दही हांडी दाल हांडी ने अपनी एक विशिष्ट पहचान बना रखी है
इनका कहना है,
धार्मिक आयोजन स्नान दान पर कोई प्रतिबंध नहीं है किंतु मेले में व्यवसायिक , झूला ,मनोरंजन आदि गतिविधियां पूर्णता प्रतिबंधित है।
सीपी गोहल
अनुविभागीय अधिकारी सिहोरा